Saturday, 3 September 2011

समझ अपनी-अपनी

कहते हैं उस एक परमात्मा ने पूरी दुनिया बनाई..जिसकी लीला इतनी न्यारी जिसे ना ही कोई समझ पाया और ना ही कोई समझ पाएगा....वो अनंनत है...निराकार है...हम सब हैं तो उस परमात्मा की सन्तान पर रूप अलग-अलग.....ये भी सोचने की बात है, कि जब हम हैं ही उस प्रभू की संतान तो हममें इतना अंतर क्यों.....अंतर इसलिए है कि सृष्टि को रचने वाली है औरत ! जिसके बिना सृष्टि कल्पना भी नहीं की जा सकती.... जिसे माँ,बेटी,औरत,बहन,पत्नी और भी कई नाम मिले हैं इस संसार में....जिसकी कोख से हम पैदा हुए हैं......जिसने 9 महीने हमें अपने पेट में पाला है.....वो माँ जो हर दुख-दर्द को पानी की तरह पीती रही....कभी अपने आंसू बाहर न आने दिए....सिर्फ उसे ही अपनी खुशियों का गला क्यों घोटना पड़ता है....उसे ही हर बार झुकना क्यों पड़ता है....लड़की चाहे तो क्या नहीं कर सकती, फिर भी वो चुप क्यों रह जाती है....?????????  

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